आज सुबह खिड़की के पास बैठी थी, और धूप की एक पतली रेखा मेरे कागज़ों पर गिर रही थी। बाहर कोई चिड़िया बार-बार एक ही सुर में चहक रही थी—एक अधूरा गीत, जो शुरू होता और अचानक रुक जाता। मैंने सोचा, शायद वह भी मेरी तरह कुछ पूरा करने की कोशिश कर रही है।
पिछले तीन दिनों से एक कहानी अटकी हुई है। मुख्य किरदार एक दरवाज़े के सामने खड़ी है, और मुझे नहीं पता कि वह अंदर जाएगी या वापस मुड़ेगी। मैंने दोनों तरीके लिखे, दोनों को काटा, फिर से लिखा। सब कुछ झूठा लगा—जैसे मैं किसी और की कहानी लिख रही हूँ।
दोपहर में मैंने एक पुरानी किताब उठाई, जिसे सालों से नहीं खोला था। एक लाइन पर निशान लगा था: "जो दरवाज़े खुलते हैं, वे कभी सवाल नहीं पूछते।" मुझे याद नहीं मैंने यह कब रेखांकित किया था, या क्यों।
शाम को मैंने फिर से वह पन्ना खोला। इस बार मैंने किरदार को नहीं, बल्कि दरवाज़े को लिखा—उसकी पुरानी लकड़ी, हैंडल पर जमी धूल, नीचे से आती ठंडी हवा। और तब मुझे समझ आया: दरवाज़ा सवाल नहीं था, निर्णय था। वह किरदार उसे खोलेगी, लेकिन पहले उसे यह स्वीकार करना होगा कि वह डरी हुई है।
कभी-कभी हम जवाब खोजते हैं, जबकि असली समस्या यह है कि हमने गलत सवाल पूछा है। मैंने यह गलती की—अपने किरदार से पूछा कि वह क्या करेगी, जबकि पूछना यह चाहिए था कि वह क्या महसूस कर रही है।
अब वह चिड़िया चुप है। शायद उसने भी अपना गीत पूरा कर लिया। मैं कल सुबह फिर लिखूंगी—इस बार दरवाज़े के उस पार से।
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