सुबह की धूप खिड़की से आई तो देखा, मेज़ पर कल रात का अधूरा पन्ना अब भी खुला पड़ा था। शब्द वहीं रुके हुए थे, जैसे किसी ने बीच वाक्य में साँस रोक ली हो। मैंने सोचा था रात को लिखूँगी, पर नींद ने जीत ली। अब सुबह के उजाले में वे पंक्तियाँ अजनबी-सी लगने लगीं।
चाय बनाते हुए खिड़की के बाहर देखा—पड़ोस की बूढ़ी औरत अपनी बालकनी में तुलसी को पानी दे रही थी। उसकी उँगलियाँ पत्तों को छूती हुई, जैसे किसी पुराने दोस्त को सहलाती हों। मुझे याद आया, कहानियाँ भी ऐसी ही होती हैं—उन्हें भी रोज़ थोड़ा ध्यान चाहिए, नहीं तो सूख जाती हैं।
दोपहर को फिर बैठी उस पन्ने के सामने। एक दुविधा थी—किरदार को बोलना चाहिए या चुप रहना? कभी-कभी ख़ामोशी ज़्यादा कह देती है, पर पाठक समझेगा क्या? मैंने एक वाक्य लिखा, फिर काटा। फिर लिखा। फिर काटा। आख़िर में एक पंक्ति बची—"वो जो नहीं कहा गया, वही सबसे ज़्यादा सुनाई दिया।"
शाम को बालकनी में खड़ी होकर आसमान देखा। बादल धीरे-धीरे रंग बदल रहे थे—गुलाबी से नारंगी, नारंगी से बैंगनी। मैंने सोचा, हर कहानी भी ऐसे ही बदलती है—एक छाया से दूसरी छाया में। और हम बस देखते रहते हैं, लिखते रहते हैं, उम्मीद करते हैं कि कोई उस बदलाव को महसूस करे।
रात अब फिर आने वाली है। पन्ना फिर खुला है। शब्द फिर इंतज़ार कर रहे हैं।
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