सुबह की धूप खिड़की के शीशे पर तिरछी पड़ रही थी, और उसकी रोशनी में धूल के कण किसी अदृश्य नृत्य में तैर रहे थे। मैं कॉफी की चुस्कियां ले रही थी, कप के किनारे पर होंठ रखकर, जब अचानक एक पंक्ति मन में कौंधी—"शब्द वहीं बिखरते हैं जहां चुप्पी सबसे गहरी होती है।" मैंने झट से नोटबुक खोली, लेकिन जब तक कलम पकड़ी, वह पंक्ति धुंधली पड़ गई, जैसे सपना जागते ही फिसल जाता है।
दोपहर में एक पुरानी कहानी को फिर से पढ़ा—वही जो पिछले महीने अधूरी छोड़ दी थी। पात्र वहीं ठहरे हुए थे जहां मैंने उन्हें छोड़ा था, किसी जमे हुए तालाब की तरह। मुझे लगा कि शायद मैंने उनसे बहुत कुछ छिपा लिया, उनकी कमज़ोरियां, उनके डर। मैंने एक पन्ना फाड़ा और फिर से शुरू किया—इस बार मुख्य किरदार को एक छोटी सी हार दी, एक ऐसा क्षण जहां वह लड़खड़ाए। अजीब बात है, जैसे ही उसे गिरने दिया, कहानी चलने लगी।
शाम को बाज़ार से लौटते हुए एक बूढ़े आदमी को अपने पोते से कहते सुना—"बेटा, हर कहानी का अंत नहीं होता, कुछ कहानियां बस ठहर जाती हैं।" मैं रुक गई। उसकी आवाज़ में इतनी सहजता थी, जैसे वह कोई गहरा सच बता रहा हो। मैंने सोचा, शायद मेरी अधूरी कहानियां भी ऐसी ही हैं—ख़त्म नहीं, बस ठहरी हुई, किसी सही पल का इंतज़ार करती।
रात में कागज़ पर कलम फिराते हुए मुझे एहसास हुआ कि लिखना सिर्फ शब्दों का चयन नहीं, बल्कि चुप्पियों का भी चयन है। हर वाक्य के बाद जो ख़ाली जगह बचती है, वहीं तो पाठक सांस लेता है। मैंने आज जो लिखा, वह पूर्ण नहीं है, लेकिन उसमें एक धड़कन है—एक अधूरापन जो पूर्ण से ज़्यादा ईमानदार लगता है।
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