सुबह की धूप खिड़की के शीशे पर तिरछी पड़ रही थी, और उस रोशनी में धूल के कण किसी मूक नृत्य में डूबे थे। मैं बस देखती रही, चाय का कप हाथ में पकड़े, सोचती रही कि क्या ये कण भी किसी कहानी का हिस्सा बन सकते हैं।
आज एक पुरानी कविता फिर से लिखने की कोशिश की। तीन साल पहले लिखी थी, तब लगा था कि बिल्कुल सही है। आज पढ़ी तो हर पंक्ति अधूरी लगी। पहले मैं इसे अपनी असफलता मानती, लेकिन आज समझ आया कि शायद यही तो लेखन है — वही शब्द, वही भाव, लेकिन हर बार एक नई आँख से देखना। मैंने वो कविता फिर से लिखी। इस बार पुरानी पंक्तियों को बचाने की कोशिश नहीं की, बस उन्हें जाने दिया।
दोपहर में एक फैसला करना था — एक कहानी प्रकाशन के लिए भेजूँ या नहीं। कहानी तैयार थी, लेकिन मन में डर था कि शायद अभी और काम की जरूरत है। फिर ख़्याल आया, अगर मैं हमेशा 'और बेहतर' की प्रतीक्षा करती रहूँगी, तो कुछ भी कभी पूरा नहीं होगा। मैंने फ़ाइल अटैच की और भेज दिया। उँगलियाँ काँप रहीं थीं, लेकिन भेज दिया।
शाम को बालकनी में बैठी तो हवा में गीली मिट्टी की महक थी, हालाँकि बारिश नहीं हुई थी। शायद किसी पड़ोसी ने गमले सींचे होंगे। उस महक में कुछ था जो मुझे बचपन की याद दिला गया — दादी के आँगन की क्यारियाँ, और उनकी आवाज़, "बेटा, मिट्टी से दोस्ती रखना, ये झूठ नहीं बोलती।"
आज मैंने सीखा कि कभी-कभी छोड़ना ही सबसे बड़ा साहस होता है — पुरानी पंक्तियों को, डर को, परफेक्शन के भ्रम को। और शायद यही वो चीज़ है जो कल की कहानी में आएगी।
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