सुबह की धूप खिड़की से आकर मेज़ पर एक तिरछी रेखा खींच रही थी। मैं कॉफी का कप हाथ में लिए बैठी थी, और सोच रही थी कि कल रात लिखी कविता में कुछ अधूरा रह गया है। शब्द सही थे, छंद भी ठीक था, पर वह जो मैं कहना चाहती थी—वह कहीं पंक्तियों के बीच खो गया था।
मैंने फिर से नोटबुक खोली। पन्ने पर स्याही के धब्बे देखे तो याद आया कि पेन की निब टूटी हुई थी, फिर भी मैं लिखती रही थी। ज़िद थी शायद, या डर कि रुकी तो वह विचार भाग जाएगा। पर आज सुबह, उजाले में पढ़ते हुए, मुझे लगा—कभी-कभी रुकना भी ज़रूरी होता है। जल्दबाज़ी में पकड़े गए शब्द अक्सर हाथ से फिसल जाते हैं।
दोपहर में बाज़ार गई। सब्ज़ी वाले ने पूछा, "आज कुछ कम ले रही हो क्या?" मैंने मुस्कुराकर कहा, "बस, आजकल ज़्यादा घर पर नहीं हूँ।" झूठ नहीं था—दिमाग़ अक्सर कहीं और होता है, रसोई में नहीं। उसने टमाटर तौलते हुए कहा, "लिखने वाले लोग अलग दुनिया में रहते हैं ना।" मैं चुप रही। शायद वह सही था।
शाम को फिर मेज़ पर बैठी। इस बार पेन बदल लिया, पर पंक्ति वही रही—अधूरी। तब समझ आया: समस्या शब्दों में नहीं थी, उस ख़ामोशी में थी जो मैं छोड़ना भूल गई थी। कविता सिर्फ़ कहने की कला नहीं, न कहने की भी है।
आज मैंने कुछ नहीं लिखा, सिर्फ़ मिटाया। और अजीब बात है—पहली बार मुझे लगा कि मैंने कुछ पूरा किया।
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