सुबह की धूप खिड़की के शीशे पर एक अजीब कोण से गिर रही थी—इतनी तिरछी कि कमरे में सिर्फ आधी रोशनी आई और आधा अंधेरा रहा। मैं बिस्तर पर बैठी रही, सोचती रही कि क्या लिखूं। कभी-कभी शब्द इतनी आसानी से आते हैं कि उंगलियां थक जाती हैं, और कभी एक भी वाक्य पूरा नहीं होता।
आज दूसरी स्थिति थी।
मैंने नोटबुक खोली, एक वाक्य लिखा, फिर काट दिया। फिर दूसरा, फिर काट दिया। यह क्या है—डर? आलस्य? शायद दोनों। शायद कुछ और जिसका नाम मुझे नहीं पता। मैंने सोचा कि शायद बाहर निकलूं, हवा लगे, तो कुछ ख्याल आए। लेकिन बाहर तेज धूप थी और मेरे पास छाता नहीं था।
तो मैं वहीं रुकी, खिड़की के पास। सड़क पर एक बच्चा साइकिल चला रहा था, बार-बार गिर रहा था, फिर उठ रहा था। उसकी मां पास खड़ी थी, कुछ नहीं कह रही थी, बस देख रही थी। मुझे लगा—यही तो है लिखना भी। गिरना, उठना, फिर गिरना।
दोपहर में मैंने एक पुरानी कहानी पढ़ी, जो मैंने साल भर पहले लिखी थी। अजीब लगा—जैसे किसी और ने लिखी हो। कुछ पंक्तियां अच्छी थीं, कुछ बेहद कमजोर। लेकिन मैंने उसे खत्म किया था, यह बात मायने रखती है। आज मैं शुरू भी नहीं कर पाई।
शाम को, जब रोशनी नरम हो गई, मैंने फिर से कोशिश की। इस बार कुछ लाइनें बची रहीं। कुछ बचना ही काफी है, शायद।
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