खिड़की के बाहर बारिश की बूँदें काँच पर एक अजीब धुन बजा रही थीं। मैं सुबह से ही उस अधूरी कहानी के सामने बैठी थी—वही, जो तीन हफ़्ते से मेरे नोटबुक के आख़िरी पन्ने पर ठहरी हुई थी। मुख्य किरदार एक मोड़ पर खड़ा था, और मुझे नहीं पता था कि उसे आगे बढ़ना चाहिए या पीछे मुड़ जाना चाहिए। शायद वह मेरे खुद के किसी अनकहे सवाल का प्रतिबिंब था।
दोपहर में, चाय बनाते हुए मैंने एक गलती की—चीनी की जगह नमक डाल दिया। पहले घूँट में ही पता चल गया। मैं हँस पड़ी, अकेले ही। फिर मुझे याद आया कि मेरी नानी कहती थीं, "जब मन कहीं और हो, तो हाथ भी भटक जाते हैं।" सच था। मेरा मन उस किरदार के साथ ही अटका हुआ था।
शाम को मैंने फ़ैसला किया। मैंने कलम उठाई और लिखा—"वह रुका नहीं, लेकिन आगे भी नहीं बढ़ा। वह बस वहीं खड़ा रहा, और समझ गया कि कभी-कभी ठहरना भी एक जवाब होता है।"
जैसे ही मैंने वह वाक्य लिखा, कुछ हल्का हो गया। कहानी पूरी नहीं हुई, पर एक दिशा मिल गई। बारिश धीमी हो चुकी थी, और मैंने खिड़की खोल दी। हवा में मिट्टी की महक थी—वही, जो हर नई शुरुआत के साथ आती है।
आज मैंने सीखा कि लिखना सिर्फ़ शब्दों को पन्ने पर उतारना नहीं है। यह अपने भीतर के उन सवालों को सुनना भी है, जो चुपचाप बैठे रहते हैं, जवाब का इंतज़ार करते हुए। और कभी-कभी, जवाब किसी मोड़ पर नहीं, बल्कि उस ठहराव में छुपा होता है।
#लेखन #कहानी #रचनात्मकता #विचार