रात के ग्यारह बजे थे जब उसने आख़िरी डिब्बा बंद किया। स्कॉच टेप की चरमराहट रुकी, तो कमरे में बस एक...
रात के ग्यारह बजे थे जब उसने आख़िरी डिब्बा बंद किया। स्कॉच टेप की चरमराहट रुकी, तो कमरे में बस एक...
रात के नौ बजे थे जब उसने दीवार से आखिरी तस्वीर उतारी। नीचे टेप के चार पीले निशान रह गए — जैसे किसी...
कमरे में एक खाली थर्मस था और दीवार पर टेप के चार निशान। वह रात के ग्यारह बजे सामान बाँध रही थी।...
रात के ग्यारह बज रहे थे जब उसने आख़िरी कार्टन बंद किया। कमरा अजीब लग रहा था — जैसे किसी ने उसकी...
रात के ग्यारह बजे थे जब उसने आख़िरी दराज़ खाली की। अंदर एक Nokia चार्जर था, जिसकी तार कहीं से टूटी...
बारिश रुक चुकी थी, पर छत से पानी अभी भी टपक रहा था। एक लय थी उस टप-टप में—कुछ तेज़, कुछ धीमी, जैसे कोई अदृश्य तबला बज रहा हो। मैं खिड़की के पास बैठी थी, डायरी खोले, पर शब्द नहीं आ रहे थे।
माँ ने पूछा था सुबह, "क्या लिखती रहती हो रोज़?" मैं क्या जवाब देती? कि कभी-कभी शब्द खुद आते हैं, और कभी-कभी मुझे उन्हें खींचना पड़ता है, जैसे कुएँ से पानी। आज वैसा ही दिन था।
फिर एक पत्ती गिरी, खिड़की के बाहर, एकदम सीधी नीचे। हवा नहीं थी, फिर भी वो झूमती हुई गिरी, जैसे किसी काल्पनिक धुन पर नाच रही हो। उस एक पल में मुझे समझ आया—कहानियाँ ऐसे ही होती हैं। वे गिरती नहीं, झूमती हैं। एक मोड़ यहाँ, एक ठहराव वहाँ।
मैंने सोचा था आज कुछ भव्य लिखूँगी, कोई महाकाव्य जैसा। पर फिर याद आया पिछले हफ़्ते की वो कहानी जो मैंने बहुत जटिल बना दी थी, इतनी कि खुद ही उलझ गई। तब मुझे एहसास हुआ—सादगी में भी गहराई होती है। छोटी चीज़ें, जैसे बारिश की आवाज़, गिरती पत्ती, ये भी तो पूरी कहानियाँ हैं।
शाम को जब मैंने फिर से कलम उठाई, तो लिखने की कोशिश नहीं की। बस उस पत्ती को याद किया, उसकी लय को। और शब्द बहने लगे, धीरे-धीरे, पर लगातार।
लिखना सिखाता है कि ठहरना भी एक कला है। जल्दबाज़ी में हम अक्सर वो खो देते हैं जो सबसे ज़रूरी है—वो ख़ामोशी जो दो शब्दों के बीच होती है, वो साँस जो दो वाक्यों के बीच लेनी चाहिए।
आज मैंने जो लिखा वो शायद कभी किसी को नहीं दिखाऊँगी। पर वो मेरे लिए है, उस पत्ती के लिए है, और उन सभी अनकहे शब्दों के लिए जो अभी भी हवा में तैर रहे हैं।
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