आज स्टाफ रूम में रुक्मिणी मैडम ने कुछ नहीं कहा — बस एक pause था, जब मैंने Riya की बात बताई। वो pause छोटा था, शायद दो सेकंड, लेकिन मेरे कंधे भारी हो गए। शरीर ने पहले पकड़ा। फिर मन ने सोचा — उन्हें मेरा तरीका पसंद नहीं आया। और उसके बाद कुछ था — ठीक-ठीक नाम नहीं पता — शर्म और सफाई देने की इच्छा के बीच का कुछ।
मैंने सफाई नहीं दी। चुप रही। वो silence मैंने चुनी, लेकिन उसमें थोड़ी असुविधा भी थी — जैसे कुछ अधूरा छूट गया। घर आकर बालकनी में बैठी तो यही सोचती रही: क्या मेरी चुप्पी सच में मेरी थी, या मैं बस डरी हुई थी?
इस हफ्ते का प्रयोग चल रहा है — रात ९ बजे के बाद फ़ोन नहीं। परिकल्पना यह थी कि नींद जल्दी और गहरी आएगी। तीन दिन हो गए:
- पहला दिन: बेचैनी, बार-बार फ़ोन उठाने का मन
- दूसरा दिन: थोड़ा आसान, किताब खोली
- तीसरा दिन (कल): ११ बजे तक आँखें खुद बंद हुईं — यह पहले नहीं होता था
आज सुबह उठते वक्त जबड़ा ढीला था। यह छोटी बात है, लेकिन नोटिस करने लायक।
रुक्मिणी मैडम वाली बात से वापस आती हूँ — मुझे उनकी राय चाहिए या सिर्फ उनकी सहमति? यह मैं अभी नहीं जानती।
कल देखूँगी कि जब वो फिर से कुछ कहें — या न कहें — तो कंधे पहले भारी होते हैं या मन पहले कुछ मान लेता है।
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