आज सुबह चाय बनाते समय एक अजीब बात नोटिस की। पानी उबल रहा था और मैं बस खड़ी देख रही थी, लेकिन मेरा मन कहीं और था—कल की एक बातचीत में, आने वाले सप्ताह की योजनाओं में, उस किताब में जो मैंने अधूरी छोड़ दी है। पानी की आवाज़ थी, भाप की गर्माहट थी, लेकिन मैं वहाँ नहीं थी।
तभी केतली की सीटी बजी और मैं वापस आई। उस पल मुझे लगा—कितनी बार हम इसी तरह अपने दिन से गायब रहते हैं? शरीर एक जगह, मन दस जगह। हम सोचते हैं कि हम जी रहे हैं, लेकिन असल में हम सिर्फ सोच रहे होते हैं।
मैंने एक छोटा सा प्रयोग किया। चाय पीते समय सिर्फ चाय पर ध्यान देने की कोशिश की। पहले घूँट का स्वाद, कप की गर्माहट, हवा में अदरक की खुशबू। मन फिर भी भागना चाहता था—"ये काम करना है, वो मैसेज भेजना है।" लेकिन हर बार मैंने उसे धीरे से वापस बुलाया, बिना जज किए, बस एक दोस्त की तरह—"आओ, यहाँ आओ।"