आज सुबह एक पुरानी गैलरी में गया जहाँ स्थानीय कलाकारों की एक छोटी सी प्रदर्शनी लगी थी। दीवारों पर लटकी पेंटिंग्स के बीच एक अजीब सी खामोशी थी, जैसे हर रंग अपनी कहानी कहने के लिए इंतज़ार कर रहा हो। सबसे पहले मेरी नज़र एक कैनवास पर पड़ी जिसमें नीले और भूरे रंगों की परतें इस तरह बिछी थीं कि रोशनी के कोण बदलते ही पूरा दृश्य बदल जाता था।
एक बुजुर्ग कलाकार कोने में खड़े होकर किसी युवा दर्शक से बात कर रहे थे। उन्होंने कहा, "कला में गलतियाँ नहीं होतीं, सिर्फ़ अनपेक्षित रास्ते होते हैं।" यह वाक्य मेरे साथ चलता रहा पूरे दिन।
मैंने एक छोटा सा प्रयोग किया—पहले पेंटिंग्स को दूर से देखा, फिर बिल्कुल पास जाकर। दूरी ने पूरे चित्र की भावना दी, लेकिन निकटता ने ब्रशस्ट्रोक की बनावट दिखाई, वे छोटे-छोटे निर्णय जो एक कलाकार हर पल लेता है। यह फ़र्क़ देखना अपने आप में एक सबक था—कभी-कभी हमें पीछे हटना होता है पूरी तस्वीर समझने के लिए।