आज सुबह की रोशनी खिड़की से छनकर दीवार पर एक अजीब सा पैटर्न बना रही थी। जैसे किसी ने हल्के हाथों से पानी के रंग बिखेर दिए हों। मैं कॉफी का कप लिए खड़ा था और सोच रहा था कि हम रोज़ कितनी सुंदरता को नज़रअंदाज़ कर देते हैं। यह रोशनी, यह छाया का खेल—यह भी तो एक कला है, बिना किसी कलाकार के।
दोपहर को मैं एक पुराने म्यूज़िक रिकॉर्ड की दुकान में गया। दुकानदार ने पूछा, "क्या ढूंढ रहे हो भाई?" मैंने कहा, "कुछ ऐसा जो मैंने पहले कभी न सुना हो।" उसने मुस्कुराते हुए एक धूल भरा विनाइल रिकॉर्ड निकाला—साठ के दशक का जैज़। उसकी उंगलियों के निशान प्लास्टिक कवर पर अब भी थे। मुझे एहसास हुआ कि कभी-कभी सबसे अच्छी खोज वो होती है जो हम योजना नहीं बनाते।
घर आकर जब मैंने वह रिकॉर्ड बजाया, तो पहले थोड़ी सी खरोंच की आवाज़ आई, फिर एक saxophone की गहरी, मखमली धुन शुरू हुई। संगीत में एक ख़ास तरह की बेचैनी थी, मगर साथ ही एक सुकून भी। यह विरोधाभास ही जैज़ की असली ख़ूबसूरती है—कैसे यह एक साथ आज़ादी और संरचना का जश्न मनाता है। हर note जानबूझकर रखा गया था, फिर भी spontaneous लग रहा था।