आज सुबह रसोई में धूप की पतली किरण सीधे मसाले के डिब्बे पर पड़ रही थी। हल्दी की चमक सोने जैसी लग रही थी। मैंने सोचा कि आज कुछ अलग बनाऊं—दाल में नींबू के छिलके का तड़का। एक छोटा सा प्रयोग।
दाल पकते समय वही पुरानी खुशबू—अरहर, हल्दी, हींग—पर इस बार मैंने आखिरी में नींबू का छिलका डाला। गलती हो गई। पहले डाल दिया, और कड़वाहट आ गई। फिर मैंने दोबारा कोशिश की—बिल्कुल अंत में, बस दस सेकंड के लिए। इस बार सही था।
तड़का लगाते समय मुझे नानी की याद आई। वो कहती थीं, "खाना सिर्फ पेट भरने के लिए नहीं, याद बनाने के लिए होता है।" उनकी रसोई में हमेशा तुलसी और धनिये की महक रहती थी।