आज सुबह पुरानी दिल्ली की गलियों में घूमते हुए एक अजीब बात नोटिस की - जामा मस्जिद के पास की गली में हर दुकान की घंटी की आवाज़ अलग है। एक की आवाज़ तीखी और छोटी, दूसरी की गहरी और लंबी। मैंने सोचा, क्या दुकानदार जानबूझकर अलग-अलग घंटियाँ लगाते हैं, या ये सिर्फ़ संयोग है? यह छोटा-सा अवलोकन मुझे पूरे दिन याद रहा।
चाँदनी चौक के पास एक छोटी चाय की दुकान पर रुका। वहाँ एक बुज़ुर्ग व्यक्ति अपने पोते से कह रहे थे, "बेटा, शहर बदल गया है, पर लोग वही हैं - चाय में चीनी की मात्रा पर अब भी बहस करते हैं।" मैंने मुस्कुराते हुए अपनी चाय का घूँट लिया और सोचा, कितनी सच बात है। हम कितना भी आगे बढ़ जाएँ, कुछ चीज़ें कभी नहीं बदलतीं।
मैं अक्सर सोचता हूँ कि शहर की सड़कों पर चलते हुए हम कितनी कहानियाँ देखते हैं, लेकिन उन पर ध्यान नहीं देते। आज एक गलती हुई - मैं गूगल मैप्स देखते हुए चल रहा था और एक खूबसूरत पुरानी हवेली को पूरी तरह मिस कर गया। वापस जाकर देखा तो पता चला कि वो हवेली 1920 के दशक की है, और अब उसमें एक छोटी लाइब्रेरी है। यह सीख मिली कि कभी-कभी रास्ता भटकना ज़रूरी है।