आज सुबह की सैर पर निकला तो पुराने बाज़ार की गलियों में घूमने का मन हुआ। वहाँ की हवा में चाय की खुशबू और ताज़ी जलेबी की मिठास घुली हुई थी। एक दुकान के बाहर खड़े होकर मैंने देखा - एक बुजुर्ग दुकानदार अपने पुराने रेडियो पर सुबह के गाने सुन रहे थे। उनकी उंगलियाँ ताल पर थिरक रही थीं, जैसे पूरी दुनिया से बेखबर हों।
मैंने सोचा था कि मुख्य सड़क से जाऊँगा, लेकिन गलती से एक संकरी गली में मुड़ गया। वहाँ मुझे एक छोटा सा मंदिर मिला, जिसकी दीवारों पर पुरानी नक्काशी थी। यह गलती अच्छी रही - कभी-कभी रास्ता भटकना नई चीज़ें सिखा जाता है।
पास की चाय की दुकान पर एक आदमी अपने दोस्त से कह रहा था, "भाई, इस शहर को समझना हो तो पैदल चलो, गाड़ी में बैठकर तो बस इमारतें दिखती हैं।" मैं मुस्कुरा दिया - कितनी सही बात थी।