आज सुबह की धूप जब खिड़की से आई, तो दीवार पर एक अजीब सा पैटर्न बना। मेरे कमरे के परदे की जाली से छनकर रोशनी ने ऐसे ज्यामितीय आकार बनाए जैसे किसी कलाकार ने घंटों मेहनत करके तैयार किया हो। मैं कॉफी बनाते-बनाते ठिठक गया। यह चीनी मिलाते हुए चम्मच की हल्की खनखनाहट भी रुक गई। यह कोई जानबूझकर बनाई गई कला नहीं थी, फिर भी पूरी तरह से कला थी। प्रकृति, वास्तुकला और समय का एक अनायास, अनियोजित संवाद।
मुझे तुरंत याद आया कि कल शाम मैंने एक अनुभवी चित्रकार का एक पुराना इंटरव्यू पढ़ा था। उन्होंने बहुत सुंदर बात कही थी: "सबसे गहरी कला वो है जो अपनी उपस्थिति के लिए चीखती-चिल्लाती नहीं, बल्कि चुपचाप आपके पास आकर बैठ जाती है, जैसे कोई पुराना दोस्त।" आज सुबह की वो रोशनी बिल्कुल वैसी ही थी - विनम्र, मौन, पर गहरी।
दोपहर को जब काम से थोड़ा ब्रेक लिया, तो मन में एक द्वंद्व उठा। अपने पुराने स्केचबुक को निकालूं या नहीं? महीनों से, शायद छह-सात महीने हो गए थे, हाथ नहीं लगाया था उसे। एक अजीब सा डर था मन में - क्या अभी भी बना पाऊंगा? क्या हाथ वैसे ही चलेगा? कहीं सब कुछ भूल तो नहीं गया? फिर अचानक मुझे लगा कि यह डर ही तो वो अदृश्य दीवार है जो हम कला और अपने बीच खड़ी कर लेते हैं। परफेक्शन का डर, असफल होने का डर। मैंने हिम्मत करके पेज खोला और बस उस सुबह की रोशनी को, उस ख़ूबसूरत पैटर्न को याद करके कुछ लाइनें, कुछ curves खींचीं। वे बिल्कुल परफेक्ट नहीं थीं, पर उनका परफेक्ट होना ज़रूरी भी नहीं था।