आज सुबह की सैर में मैं पुराने बाज़ार की गलियों से होकर गुज़र रहा था। हवा में गरम चाय और तले हुए समोसों की खुशबू तैर रही थी, और दुकानदार अपनी दुकानें खोलने में व्यस्त थे। एक बुज़ुर्ग ने अपनी साइकिल पर ताज़े फूलों की टोकरी लादी हुई थी—गेंदे के नारंगी और सफेद फूल सुबह की धूप में चमक रहे थे।
मैं एक छोटी सी चाय की दुकान पर रुका, जहाँ काउंटर पर खड़े एक व्यक्ति ने कहा, "भाई साहब, आज की चाय में इलायची ज़्यादा डाल दी है—लेकिन कोई बात नहीं, ज़िंदगी में थोड़ा तीखापन तो चाहिए ही।" मैं मुस्कुरा दिया। उसकी बात में एक अजीब सी सच्चाई थी। हमने अपनी-अपनी चाय की चुस्कियाँ लीं, और बस चुपचाप सड़क पर आते-जाते लोगों को देखते रहे।
मैंने एक छोटा सा प्रयोग किया—आज मैं अपना सामान्य रास्ता छोड़कर एक संकरी गली में मुड़ गया, जिसे मैं हमेशा नज़रअंदाज़ कर देता था। वहाँ एक पुराना मंदिर था, जिसकी दीवारों पर नीले और हरे रंग की टाइलें लगी थीं। एक बिल्ली धूप में लेटी हुई थी, बिल्कुल बेफिक्र। मुझे लगा, शायद हम भी कभी-कभी रास्ता बदलकर कुछ नया देख सकते हैं—बस एक मोड़ की दूरी पर।