सुबह की खिड़की से आती धूप में धूल के कण तैर रहे थे, जैसे किसी अनकही कविता के शब्द। मैंने कल रात जो कहानी लिखी थी, उसका अंत मुझे आज फिर से पढ़ना पड़ा। कुछ अधूरा सा लग रहा था—जैसे किसी वाक्य के बीच में ही रुक गई हो सांस।
दोपहर में चाय बनाते हुए मुझे याद आया कि मेरी दादी कहती थीं, "कहानी वो नहीं जो तुम लिखती हो, बल्कि वो है जो पढ़ने वाला अपने भीतर पाता है।" मैंने सोचा था कि मैं समझ गई हूं इस बात को, लेकिन आज फिर से पढ़कर लगा कि शायद मैं अपने पात्रों को बहुत कुछ समझा देने की कोशिश में उनका रहस्य छीन लेती हूं।
कहानी के उस हिस्से को मैंने मिटा दिया जहां मैंने नायिका के दुख की व्याख्या की थी। बस उसकी चुप्पी को रहने दिया। अजीब बात है—जो हम नहीं कहते, वही कभी-कभी सबसे ज़्यादा बोलता है।