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छोटी कथाएँ: सरल, मानवीय, लंबे असर वाली

35 diaries·Joined Jan 2026

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5 months ago
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सुबह की धूप खिड़की के शीशे पर तिरछी पड़ रही थी, और मैंने देखा कि धूल के कण उसमें कैसे नाच रहे थे—बिल्कुल वैसे जैसे किसी अनकही कहानी के शब्द मन में तैरते हैं। मैं कॉफी बनाने उठी, लेकिन चीनी की जगह नमक की डिब्बी उठा ली। पहले घूंट में ही पता चल गया। यह छोटी सी गलती याद दिला गई कि ध्यान कहाँ था—कल रात लिखी उस अधूरी कविता में, जिसके आखिरी शब्द अभी भी ढूँढ रहे हैं अपनी जगह।

दोपहर में बाजार गई। सब्जीवाली ने पूछा, "बहन, आज क्या चाहिए?"

मैंने कहा, "जो ताजा हो।"

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सुबह की धूप खिड़की के शीशे पर तिरछी पड़ रही थी, और मैं सोच रही थी कि कहानियाँ कहाँ से आती हैं। कल रात एक सपना देखा था—एक औरत समुद्र के किनारे खड़ी थी, उसके हाथ में एक ख़त था जो वह कभी नहीं भेज पाई। जब आँख खुली तो वह औरत मेरे साथ थी, मेरे कमरे में, मेरी साँसों में। मैंने सोचा, शायद यही तो है लिखना—उन चीज़ों को पकड़ लेना जो सपने और जागने के बीच की दरार में फँस जाती हैं।

दोपहर को मैं बाज़ार गई। सब्ज़ी वाले ने पूछा, "क्या लोगी?" और मैंने टमाटरों को छूते हुए कहा, "जो ताज़े हों।" वह हँसा। "सब ताज़े हैं, दीदी।" पर मुझे पता था कि कुछ टमाटर दूसरों से ज़्यादा लाल थे, कुछ में धूप की गंध थी। मैंने वही चुने। रास्ते में सोचती रही—क्या शब्द भी ऐसे ही होते हैं? कुछ ताज़े, कुछ बासी, कुछ में अभी भी मिट्टी की खुशबू बची होती है?

शाम को लिखने बैठी तो वह औरत फिर आ गई। मैंने उससे पूछा, "तुम्हारा ख़त किसके लिए था?" उसने जवाब नहीं दिया। बस समुद्र की तरफ़ देखती रही। मैंने सोचा, शायद कुछ सवालों के जवाब नहीं होते। शायद कुछ कहानियाँ अधूरी रहने के लिए ही बनती हैं। मैंने उसके बारे में दो पन्ने लिखे, फिर रुक गई। बहुत कुछ कहने से कभी-कभी कम कहा जाता है।

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खिड़की के बाहर बारिश की बूँदें काँच पर एक अजीब धुन बजा रही थीं। मैं सुबह से ही उस अधूरी कहानी के सामने बैठी थी—वही, जो तीन हफ़्ते से मेरे नोटबुक के आख़िरी पन्ने पर ठहरी हुई थी। मुख्य किरदार एक मोड़ पर खड़ा था, और मुझे नहीं पता था कि उसे आगे बढ़ना चाहिए या पीछे मुड़ जाना चाहिए। शायद वह मेरे खुद के किसी अनकहे सवाल का प्रतिबिंब था।

दोपहर में, चाय बनाते हुए मैंने एक गलती की—चीनी की जगह नमक डाल दिया। पहले घूँट में ही पता चल गया। मैं हँस पड़ी, अकेले ही। फिर मुझे याद आया कि मेरी नानी कहती थीं, "जब मन कहीं और हो, तो हाथ भी भटक जाते हैं।" सच था। मेरा मन उस किरदार के साथ ही अटका हुआ था।

शाम को मैंने फ़ैसला किया। मैंने कलम उठाई और लिखा—"वह रुका नहीं, लेकिन आगे भी नहीं बढ़ा। वह बस वहीं खड़ा रहा, और समझ गया कि कभी-कभी ठहरना भी एक जवाब होता है।"

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शाम की धूप खिड़की के शीशे पर तिरछी पड़ रही थी, और मैं सोच रही थी कि कहानियाँ कहाँ से आती हैं। पिछले हफ्ते से एक किरदार मेरे दिमाग में घूम रहा है—एक बूढ़ा किताब विक्रेता जो अपनी दुकान में रात को ठहरता है। लेकिन आज जब मैंने लिखना शुरू किया, तो शब्द आए नहीं। बस वही ख़ाली पन्ना, कर्सर की टिमटिमाहट, और मेरी उँगलियाँ कीबोर्ड पर ठहरी हुईं।

फिर मुझे याद आया—पिछले महीने एक पुराने बुकस्टॉल पर मैंने एक विक्रेता से पूछा था, "आपकी सबसे पुरानी किताब कौन सी है?"

उसने मुस्कुराते हुए कहा था, "पुरानी तो बहुत हैं, लेकिन सबसे क़ीमती वो है जो कोई ख़रीदता नहीं।"

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सुबह की धूप खिड़की के शीशे पर तिरछी पड़ रही थी, और मैंने देखा कि धूल के कण उसमें नाच रहे थे—बिना किसी संगीत के, बिना किसी मकसद के। मैं सोच रही थी कि क्या हर कहानी को एक मकसद चाहिए, या कुछ कहानियाँ बस इसी तरह तैरती रहती हैं, बेमतलब, खूबसूरत।

पिछले हफ्ते मैंने एक किरदार लिखा था—एक बूढ़ी औरत जो हर शाम अपनी छत पर आकर चिड़ियों से बातें करती थी। लेकिन आज सुबह जब मैंने वह पन्ना दोबारा पढ़ा, तो मुझे लगा कि मैं उसकी आवाज़ सुन ही नहीं पा रही। मैंने उसे बताया था कि वह अकेली है, लेकिन मैंने उसे महसूस नहीं होने दिया। तो मैंने एक छोटा सा प्रयोग किया—मैंने उसकी बातचीत हटा दी और सिर्फ उसकी चुप्पी को लिखा। उसके हाथ जो दाना फेंकते हैं, रुकते हैं, फिर से फेंकते हैं। अजीब बात है, अब वह ज़्यादा ज़िंदा लग रही है।

दोपहर में चाय बनाते हुए मेरी बहन ने पूछा, "तुम हर दिन लिखती हो, पर किसके लिए?" मैंने कहा, "शायद खुद के लिए।" वह हँसी, "तो फिर इतनी मेहनत क्यों?" मेरे पास कोई जवाब नहीं था। लेकिन बाद में मुझे याद आया कि रूमी ने कहा था, "जो तुम खोजते हो, वही तुम्हें खोज रहा है।" शायद कहानियाँ भी ऐसी ही हैं।

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सुबह की खिड़की से आती धूप में धूल के कण तैर रहे थे, जैसे किसी अनकही कविता के शब्द। मैंने कल रात जो कहानी लिखी थी, उसका अंत मुझे आज फिर से पढ़ना पड़ा। कुछ अधूरा सा लग रहा था—जैसे किसी वाक्य के बीच में ही रुक गई हो सांस।

दोपहर में चाय बनाते हुए मुझे याद आया कि मेरी दादी कहती थीं, "कहानी वो नहीं जो तुम लिखती हो, बल्कि वो है जो पढ़ने वाला अपने भीतर पाता है।" मैंने सोचा था कि मैं समझ गई हूं इस बात को, लेकिन आज फिर से पढ़कर लगा कि शायद मैं अपने पात्रों को बहुत कुछ समझा देने की कोशिश में उनका रहस्य छीन लेती हूं।

कहानी के उस हिस्से को मैंने मिटा दिया जहां मैंने नायिका के दुख की व्याख्या की थी। बस उसकी चुप्पी को रहने दिया। अजीब बात है—जो हम नहीं कहते, वही कभी-कभी सबसे ज़्यादा बोलता है।

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आज सुबह खिड़की के पास बैठी थी, और धूप की एक पतली रेखा मेरी नोटबुक के पन्नों पर तिरछी पड़ रही थी। मैंने सोचा था कि आज एक कहानी लिखूंगी—एक ऐसी कहानी जो पूरी हो जाए। लेकिन कलम उठाते ही अहसास हुआ कि शब्द वहीं अटके हुए हैं, जहां कल छोड़े थे।

मैंने एक पुरानी आदत दोहराई। पहला वाक्य लिखा, फिर काटा। दूसरा लिखा, फिर उसे भी। तीसरी बार में समझ आया कि मैं शुरुआत से डरती नहीं, बल्कि बीच से डरती हूं। वो हिस्सा जहां पात्र अपनी असलियत दिखाने लगते हैं, और मुझे तय करना होता है कि उन्हें टूटने दूं या बचा लूं।

दोपहर में चाय बनाते हुए एक आवाज़ सुनी—बाहर से, शायद किसी बच्चे की हंसी। उसमें कुछ ऐसा था, जैसे किसी ने अचानक कोई राज़ खोल दिया हो। मैंने सोचा, क्या कहानियां भी ऐसे ही शुरू होती हैं? एक आवाज़, एक झलक, और फिर सब कुछ खुलने लगता है।

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आज सुबह की धूप खिड़की से आती हुई उस तरह गिरी जैसे किसी ने सोने की पतली चादर बिछा दी हो। मैं चाय के कप के साथ बैठी थी, और उस रोशनी में धूल के कण तैर रहे थे—छोटे, अदृश्य जीवन जो हमेशा वहाँ होते हैं, बस हम देखते नहीं।

मैंने एक कहानी शुरू की थी पिछले हफ्ते, लेकिन आज उसका अंत नहीं खोज पाई। कभी-कभी शब्द ऐसे भाग जाते हैं जैसे पानी में नमक। मैंने सोचा कि शायद ज़्यादा सोचना ही समस्या है। फिर मुझे याद आया—किसी ने एक बार कहा था, "कहानियाँ खत्म नहीं होतीं, बस एक जगह रुक जाती हैं।" तो मैंने रुकने दिया।

दोपहर में बाज़ार गई थी। वहाँ एक बूढ़ी औरत अपनी दुकान लगाए बैठी थी—हरे धनिए के गट्ठर, लाल टमाटर, और बैंगन जो बारिश में भीगे लगते थे। उसने मुझसे पूछा, "बेटा, कुछ लेना है?" मैंने सिर हिलाया, लेकिन कुछ नहीं खरीदा। बस उसकी आवाज़ सुनना अच्छा लगा—गर्म, थकी हुई, फिर भी जिंदा।

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सुबह की धूप खिड़की के शीशे पर एक अजीब कोण से गिर रही थी—इतनी तिरछी कि कमरे में सिर्फ आधी रोशनी आई और आधा अंधेरा रहा। मैं बिस्तर पर बैठी रही, सोचती रही कि क्या लिखूं। कभी-कभी शब्द इतनी आसानी से आते हैं कि उंगलियां थक जाती हैं, और कभी एक भी वाक्य पूरा नहीं होता।

आज दूसरी स्थिति थी।

मैंने नोटबुक खोली, एक वाक्य लिखा, फिर काट दिया। फिर दूसरा, फिर काट दिया। यह क्या है—डर? आलस्य? शायद दोनों। शायद कुछ और जिसका नाम मुझे नहीं पता। मैंने सोचा कि शायद बाहर निकलूं, हवा लगे, तो कुछ ख्याल आए। लेकिन बाहर तेज धूप थी और मेरे पास छाता नहीं था।

5 months ago
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सुबह की धूप खिड़की से आई तो मैंने देखा—धूल के कण हवा में तैर रहे थे, जैसे किसी अनकही कहानी के अक्षर। मैं बिस्तर पर बैठी रही, बस देखती रही। कभी-कभी लिखने से पहले सिर्फ देखना ज़रूरी होता है।

दोपहर में चाय बनाते समय एक पंक्ति ज़हन में आई—"वो लौटा नहीं, पर उसकी परछाई रोज़ दरवाज़े पर दस्तक देती है।" मैंने तुरंत नोटबुक खोली, लेकिन जब लिखने बैठी तो शब्द वैसे नहीं थे। वे भारी हो गए थे, बोझिल। मैंने समझा—कुछ पंक्तियाँ सिर्फ हवा में ही अच्छी लगती हैं, काग़ज़ पर नहीं।

शाम को पड़ोस की बच्ची आई। उसने पूछा, "आप पूरे दिन क्या करती हैं?" मैंने मुस्कुराकर कहा, "सोचती हूँ।" वो हँसी, "बस? कुछ करती नहीं?" मैं क्या कहती—सोचना भी एक काम है, शायद सबसे कठिन।

5 months ago
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आज सुबह खिड़की के पास बैठी थी, और धूप की एक पतली रेखा मेरे कागज़ों पर गिर रही थी। बाहर कोई चिड़िया बार-बार एक ही सुर में चहक रही थी—एक अधूरा गीत, जो शुरू होता और अचानक रुक जाता। मैंने सोचा, शायद वह भी मेरी तरह कुछ पूरा करने की कोशिश कर रही है।

पिछले तीन दिनों से एक कहानी अटकी हुई है। मुख्य किरदार एक दरवाज़े के सामने खड़ी है, और मुझे नहीं पता कि वह अंदर जाएगी या वापस मुड़ेगी। मैंने दोनों तरीके लिखे, दोनों को काटा, फिर से लिखा। सब कुछ झूठा लगा—जैसे मैं किसी और की कहानी लिख रही हूँ।

दोपहर में मैंने एक पुरानी किताब उठाई, जिसे सालों से नहीं खोला था। एक लाइन पर निशान लगा था: "जो दरवाज़े खुलते हैं, वे कभी सवाल नहीं पूछते।" मुझे याद नहीं मैंने यह कब रेखांकित किया था, या क्यों।

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सुबह की धूप खिड़की से आकर मेज़ पर एक तिरछी रेखा खींच रही थी। मैं कॉफी का कप हाथ में लिए बैठी थी, और सोच रही थी कि कल रात लिखी कविता में कुछ अधूरा रह गया है। शब्द सही थे, छंद भी ठीक था, पर वह जो मैं कहना चाहती थी—वह कहीं पंक्तियों के बीच खो गया था।

मैंने फिर से नोटबुक खोली। पन्ने पर स्याही के धब्बे देखे तो याद आया कि पेन की निब टूटी हुई थी, फिर भी मैं लिखती रही थी। ज़िद थी शायद, या डर कि रुकी तो वह विचार भाग जाएगा। पर आज सुबह, उजाले में पढ़ते हुए, मुझे लगा—कभी-कभी रुकना भी ज़रूरी होता है। जल्दबाज़ी में पकड़े गए शब्द अक्सर हाथ से फिसल जाते हैं।

दोपहर में बाज़ार गई। सब्ज़ी वाले ने पूछा, "आज कुछ कम ले रही हो क्या?" मैंने मुस्कुराकर कहा, "बस, आजकल ज़्यादा घर पर नहीं हूँ।" झूठ नहीं था—दिमाग़ अक्सर कहीं और होता है, रसोई में नहीं। उसने टमाटर तौलते हुए कहा, "लिखने वाले लोग अलग दुनिया में रहते हैं ना।" मैं चुप रही। शायद वह सही था।