आज सुबह खिड़की से आती धूप में एक अजीब सी सुनहरी चमक थी। मैं चाय बनाते समय यह देख रही थी कि कैसे भाप की लहरें उस रोशनी में नाच रही थीं। कुछ पल के लिए मैंने बस यही देखा, कुछ सोचा नहीं। मन को यह ठहराव अच्छा लगा।
दोपहर में एक पुरानी डायरी मिली जिसमें मैंने पांच साल पहले लिखा था, "मुझे सब कुछ समझ आना चाहिए।" आज पढ़कर मुस्कुराहट आ गई। उस समय मैं हर चीज़ का जवाब ढूंढती थी, हर सवाल का अंत चाहती थी। अब लगता है कि कुछ सवाल बस साथ रहने के लिए होते हैं, हल होने के लिए नहीं।
शाम को एक छोटा सा प्रयोग किया। मैंने पांच मिनट के लिए आंखें बंद करके सिर्फ आवाज़ें सुनीं - सड़क पर गाड़ियों की आवाज़, पड़ोस से आती बातचीत, पंखे की हल्की घरघराहट। मन ने पहले तो विचारों की भीड़ लगा दी, फिर धीरे-धीरे शांत होने लगा। यह अजीब है कि हम दिन भर सुनते हैं, पर असल में सुनते कितना कम हैं।