आज सुबह छह बजे निकला था, सोचा कि पुरानी दिल्ली की गलियों में कुछ नया मिलेगा। चांदनी चौक के पास एक संकरी गली में मुड़ा जहाँ पहले कभी नहीं गया था। दीवारों पर हल्की नारंगी धूप पड़ रही थी, और हवा में तली हुई पूड़ियों की महक थी।
एक छोटी सी चाय की दुकान के बाहर रुका। दुकानदार ने पूछा, "पहली बार आए हो यहाँ?" मैंने हाँ में सिर हिलाया। उसने मुस्कुराते हुए कहा, "यह गली अभी शांत है, दो घंटे बाद यहाँ पैर रखने की जगह नहीं मिलेगी।" उसकी बात सच निकली—जब मैं लौटा तो वही जगह लोगों, ठेलों और आवाज़ों से भरी हुई थी।
मैंने एक गलती की—गूगल मैप पर भरोसा करके एक शॉर्टकट लिया, लेकिन वह रास्ता निर्माणाधीन निकला। बीस मिनट घूमने के बाद समझ आया कि कभी-कभी पुराने ढंग से, लोगों से पूछकर रास्ता ढूँढना बेहतर होता है। एक रिक्शा वाले ने मुझे सही दिशा दिखाई, और मुझे लगा कि शहर को समझने का असली तरीका यही है—लोगों से बात करना, न कि स्क्रीन को घूरना।