आज सुबह की सैर के दौरान शहर के पुराने बाज़ार से गुज़रा। सूरज अभी पूरी तरह नहीं निकला था, लेकिन दुकानों की शटर खुलने की आवाज़ें गूंज रही थीं - धड़ाम, धड़ाम, एक लय में जैसे शहर की सुबह का अपना संगीत हो। चाय की दुकान से आती महक ने मुझे रोक लिया।
दुकान के बाहर खड़े होकर चाय पीते हुए एक बुज़ुर्ग साहब बोले, "भाई, रोज़ सुबह यहीं खड़े दिखते हो। क्या ढूंढते रहते हो इन गलियों में?" मैंने मुस्कुराते हुए कहा, "कुछ नहीं काका, बस शहर को सुनने की कोशिश करता हूं।" उन्होंने सिर हिलाया जैसे मुझे थोड़ा पागल समझ लिया हो, लेकिन प्यार से।
मैंने आज एक छोटा सा प्रयोग किया - हमेशा मैं तेज़ क़दमों से चलता हूं, लेकिन आज जानबूझकर धीरे चला। पता चला कि जब आप धीरे चलते हैं तो दुनिया अलग दिखती है। दीवारों पर लगे पुराने पोस्टर, सीढ़ियों पर बैठी बिल्ली, खिड़की से झांकते गमलों की रंगीनियां - ये सब पहली बार देखा जैसे।